वक़्त
वक़्त – समय, या कंहू दरिया
बहता जहाँ है जीवन…
बहता कभी अपनी दिशा में
और भटकता भी कभी
हर भंवर में डूबने की
चाह भी जाती नहीं
Read the rest of this entry »
लम्हे
एक ऐसे लम्हे की तलाश, जिसमें खुद को पाऊ
या ऐसे ही गुजरते लम्हों में, खुद को खोता जाऊ
कुछ लम्हे हांथो से बीन-बीन, रखे मिट्टी के बर्तन में
एक कोशिश उनको थामने की, ये सोच ही रहा था कि
कुछ बीत गये झगमग करते, और कुछ धुंधले से थमे हुए
जाने दू उनको भी मैं गुजर, या थाम के कोई जतन करू
मंजिले
कितनी ही मंजिले बाकी है अब तक
कितनी ही राहों से गुजरना है शब तक
हर शाम अंधेरे से मिलते ही फ़िर से
हर सुबह के सूरज की चाह है दिल में
चाँद से बाते
मै हूँ जो हर रात, हर घडी
चाँद से बाते करता हूँ
इस दिल के सारे सपनो को
मै उसके दिल मे भरता हूँ
Read the rest of this entry »
बेरंग
मैने मेरे ज्ञान से पूछा, बता, गर पता तुझको है
हर दिन जो ये नया सा लगता
जीवन उसमे नया क्या है ?
वो ही तमाशे, वो ही है मेले फिर भी हर पल लगे अकेले
खुद से सब अंजान है क्यो?
हर चेहरा, हर सुबह अनोखा रंग भरे आँखो मे हजारो
निकल पडे लेने को ट्क्कर
इस जग की हर चट्टानो से
शाम ढले, बेरंग सा हो कर हर चेहरा क्यो दिखता य़ू बजारो मे
जैसे अपना ही कोई रंग
ढूढता उन गलियारो मे
जिन गलियारो मे, झिलमिल करती रंगबिरंगी, टिम-टिम करती
कितनी है रोशनी, उन बत्तियोँ की फिर भी जो रंग सुबह था चेहरे पे
वो दिखा नही इन रंगीन उजियारो मे