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पछाईयाँ

17 Oct

बादलो की परछाईयो को पकडने की चाह मे

चल पडा मै उठ के यूहीँ, एक अंजानी सी राह मे

सोचा न एक पल भी, कि कैसी ये चाह है

जिसकी न मंजिल, ये कैसी वो राह है

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