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बादलो की परछाईयो को पकडने की चाह मे चल पडा मै उठ के यूहीँ, एक अंजानी सी राह मे सोचा न एक पल भी, कि कैसी ये चाह है जिसकी न मंजिल, ये कैसी वो राह है (more…)