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मंजिले

31 Mar

कितनी ही मंजिले बाकी है अब तक
कितनी ही राहों से गुजरना है शब तक

हर शाम अंधेरे से मिलते ही फ़िर से
हर सुबह के सूरज की चाह है दिल में

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